Wednesday, May 16, 2007

रिक्तता और नवीनता

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मेरे प्रिय पाठक:
भेंट नया कुछ तुम्हें करूँ
ऐसी कोई लेखनी लिखूँ;
जिस से
एक बार फ़िर हो उठे
तुम्हारा रोआं- रोआं रोमांचित
और मैं स्वंय भी हो उठूँ
पुनः हर्षित;
यही सोच कर उठाई थी कलम

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