Tuesday, Apr 24, 2007

तुम एक गोरखधन्दा हो: नाज़ खैलवी की शायरी

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मैने यह कव्वाली बहुत बार सुनी पर जब कभी भी अपने मित्रों के साथ इस उम्दा शायरी को बाँटना चाहा, उर्दू ज़ुबान की सीमित जानकारी आड़े आ गयी। मैं खुद भी उर्दू का जानकार नहीं हूँ। पर इतना ज़रूर समझता हूँ कि दुनिया कि सुनहरी शायरी में से बहुत सारी, उर्दु ज़ुबान में है। इस लिये ‘कोमल वाणी’ के इस प्रसंग में मेरी कोशिश है कि मैं खैलवी साहब कि इस कव्वाली का अपेक्षाक्रित आसान शब्दों में तरजुमा प्रस्तुत करूँ, न सिर्फ़ अपने लिये बल्कि अपने उन सब मित्रों के लिये जो, उर्दु की सीमित जानकारी की वजह से इतनी गहरी और खूबसूरत शायरी से महरूम हैं। क्यों कि मैं खुद उर्दू नहीं जानता, इस लिये ज़ाहिर है कि कहीं कहीं चूक हो जाये। इस के लिये मैं उर्दू ज़ुबान के जानकारों से माफ़ी चाहता हूँ और विनती करता हूँ कि मेरा भूल-सुधार करें। वैसे जहन्नुम का मतलब hell और बहिश्त का मतलब
paradise होता है। बोलते समय उलटा बोल दिया है। सो, माफ़ कीजियेगा।

प्रसंग के अंत में, नुसरत फ़तेह अली खान साहब की आवाज़ में यही कव्वाली आप की नज़्र करूँगा। लगभग 30 मिनट की कव्वाली है। सब काम-काज निपटा कर, रात के सन्नाटे में मेरे तरजुमे की मदद से, आराम से बैठ कर, कव्वाली का लुत्फ़ लीजियेगा। याद रखियेगा, जल्दबाज़ी में powerful poetry भी कोसी-कोसी, lukewarm ही लगेगी। तसल्ली से सुनिये और मज़ा उठाइये। अगर चाहें तो कव्वाली सुनते समय, उसका सरल explanation आप मेरे web-blog पर देख सकते हैं। For that, point your browser to: http://retroposts.blogspot.com/2007/04/blog-post.html

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